Ranchi, February 08 2012Volume: 2, Issue : 16
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Johar Disum Khabar
   
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-- जोहार दिसुम बट ले टटका-टटका--Kharia|Mundari|Kurux|Santali|Ho|Kurmali|Khortha|Panchpargania

April 1st
उलगुलान कर सौदा

सुनेक में बेस नइ लागेला, लगिन ई सच हय। झारखंड आंदोलन कर सुरुआती दिन से लेइ के आइज तक ‘उलगुलान’ (अस्मिता आउर आंदोलन) के बेचेक कर काम जारी हय। एक दने झारखंडी जनता अपन अस्मिता, अधिकार आउर मुकति ले संघर्स करत हे, तो दोसर दने राइज आउर केंद्र कर सरकार, पूंजीपति आउर उनकर दलाल राजनीतिक पाटीमन आउर झारखंडी समाज कर भीतरेहें लुकाल ‘आस्तीन कर सांप’ हिआँ कर जनांदोलन के बेचेक में भिरल हय। उलगुलान कर सौदा का तइर होवत हे, कोन करत हे आउर झारखंडी जनता उपरे उकर का प्रभाव पड़त हे, एहे सउब बात के खोइल के राइख देहयँ नोजवान पत्राकार आउर मानवाधिकार कार्यकत्र्ता ग्लैडसन डुंगडुंग। एखने प्रकासित अपन पहिल किताप ‘उलगुलान का सौदा’ में।
ग्लोबलाइजेशन कर दौर में झारखंड जइसन राइज देसी-बिदेसी बहुरास्ट्रीय कंपनी मनक पहिल निसाना पर हय। साठ साल में होवल औद्योगिकरण से तो हिआँ का देस कर कोनवे आदिवासी आउर पिछड़ा इलाका में बिकास नइ होलक। तइयो अभियो बेसर्म आउर ढीठ सरकार-उद्योग जगत कहत हे कि जमीन देउ, जंगल देउ, नदी देउ, पहार देउ। हमिन बिकास करब। सच बात तो ई हय कि बिकास कर नाँव में झारखंड कर आदिवासी-मूलवासीमन कर बिस्थापन कर समस्या गहराते जात हे। उड़ीसा में तो बीजू कर सरकार भाजपा संग मिल के आदिवासीमन के खतमे कइर देहे। झारखंड में लगिन स्थिति उलटा हय। हिआँ जमीन बँचायक ले सउब झारखंडी जुइट के मोरचा खोइल देहयँ। राइज कर गोटा जंगल इलाका में खदान आउर उद्योग कर खिलाप जबरजस्त प्रतिरोध हय। जनता कर एकजुट संघर्स कर कारनेहें एखन तक कोनो कंपनी जमीन छीनेक में सपफल नइ होयक पाइर हे। जनता कर संगठित ताकइत कर आगे सरकार लचार हय।
‘उलगुलान का सौदा’ मुध रूपे तोरपा-खूँटी इलाका में जिंदल-मित्तल कर खिलाफ चलेकवाला जनांदोलन उपरे केंद्रित हय। युवा पत्राकार ग्लैडसन ई आंदोलन से सुरुवे से जुड़ल हयँ। सेले ऊ आंदोलन के आउर उकर कमी-बेसी के बेस तइर बुझयँना। ग्लैडसन खुदे एगो बिस्थापित हयँ। उनकर गोटा परिवार केलाघाघ डैम (सिमडेगा) कर कारन बिस्थापित होय जाय रहे। सेले उनकर किताप बिस्थापन कर समस्या के बाहरे से नइ बलुक भीतर से देखेला आउर उकर सउब परत के एक-एक कइरके उघड़ायला। किताब कर दोसर खासियत ई हय कि इकर में आदिवासी दृस्टि से समस्या कर राजनीतिक बिसलेसन करल जाहे। काले कि बिस्थापन उपरे लिखल गेल जादातर किताप ऊमन लिख हयँ जे ई समस्या पहें काम करत हयँ। उसन अधिकांस लेखक झारखंडी इया आदिवासी नइ लागयँ। सेले ईमानदारी से लिखल बाद हों समस्या कर बिसलेसन में औपनिवेसिक मानसिकता ढुकलेहें रहेला। मुदा उलगुलान का सौदा खांटी आदिवासी लेखक लिख हे जे माटी कर दरद से जनमल हय।
‘उलगुलान का सौदा’ में कुल दस गो लेख हय। ‘उलगुलान के सौदे की मुस्कुराहट’, ‘उलगुलान का सौदा मंजूर नहीं’, ‘मित्तल के समाज सेवा का भूत’, ‘मित्तल को आदिवासी की साझेदारी मंजूर नहीं’, ‘संघर्ष जारी है....!’, ‘आदिवासी एकता तोड़ने की साजिश’, ‘मीडियाः लोकतंत्रा का प्रहरी या बाजारू सामान?’, ‘पुनर्वास की धोखी नीति 2008’, ‘जनांदोलन ऐतिहासिक अन्याय का परिणाम’ आउर ‘झारखंड का विकास क्यों नहीं होता? इकर प्रकासन ‘झारखंड इंडिजिनस पफोरम’ बट ले करल जाहे। 88 पेज कर ई महतपूरन किताप में औद्योगिक घरानामन, सरकार, मीडिया आउर दमनकारी बिकास कर दलाल ‘दिकू सत्ता’ कर पोल खोलेक में लेखक पूरापूरी सपफल होहे। झारखंड में आदिवासी-मूलवासी कर नाँव में राजनीति करेकवाला पाटीमन होओक इया हिआँ कर मीडिया, सउब कर वर्ग चरित्रा उपरे उनकर नजइर ‘एक्सरे’ तइर पड़ हे। राइज कर पुनर्वास नीति 2008 कर ‘चीरफाड़’ तर्कसंगत तरीका से कइर के लेखक बता हय कि इसन नीति से बिस्थापितमन के कोनो राहत नइ मिली। इकर संगे हंे ई किताप कर आखिरी लेख ‘झारखंड का विकास क्यों नहीं होता’ में ग्लैडसन डुंगडुंग मुधधारा कर बिकास अवधारना के खारिज कइर के झारखंडी नजइर से बिकास कर नवाँ मॉडल सुझा हयँ।
21 Mar 2009 by disum
डाइन गाथा

डाइन गाथा (हिन्दी)
लेखक : संजय बसु मल्लिक
प्रकासक : सामुदायिक वन पालन संस्थान, रांची (झारखंड)
वर्ष 2009 पृष्ठ 168 मूल्य 175 रु.

ई किताब झारखंड आंदोलन कर अगुवा रहल आउर समाजिक कार्यकर्ता संजय बसु मल्लिक लिख हयँ। भारतीय समाज में कोनो महिला के का ले ‘डाइन’ कहयँना, उकरेहें समाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आउर मनोवैज्ञानिक बिसलेसन ई किताब में ऊ प्रस्तुत कइर हयँ।
21 Mar 2009 by disum

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